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      ।। कृष्णोवाच ।।    कामिनी कामायनी क्यों सखा ? विभ्रांत क्यों हो ?kkk khhhhh ये तुम्हें क्या हो गया है ? कितने बंधन में घिरे हो क्या तेरा कुछ खो गया है ?     कुछ तो करना ही पड़ेगा मोह से विश्राम लेलो यह धरा है कर्म भूमि आँखें खोलो , आँखें खोलो ।     ये नहीं जब जानते हैं    काल ने इनको कहा क्या ?    व्यर्थ का यह राग कैसा ?    यह तुम्हें क्यों बांधती है ? ये नहीं बांधव हैं तेरे नाम के बस मोहरे हैं    मत घिरो बादल में तम के   आगे भी कुछ रोशनी है   कर्म हैं नियत तुम्हारे   हाथ फिर क्यों बांधना है । अब पलायन सोचते क्यों ? अस्त्र भुजबल में सजा लो वीरता का मंत्र लेकर तुम भी मस्तक यूं उठा लो ।    उस अधम से मत डरो तुम / चल रहा अन्याय पर वह उस पथिक का रास्ता क्या ? जो अनीति से भरा है ।    छल से , बल से , यूं अकल से    चाहता कुछ और है वह ।    पर नहीं वह जा नता है    क्या...
         कौन सी जाति ? वे चार थीं , काफी सशक्त , पढ़ी लिखी , नाम धारी , स्वयम सिद्ध और रुतबेदार । उनकी कलमों के कदरदान हजारों मे नहीं , लाखों मे थे ।   संयोग था , वह अंतराष्ट्रिय स्तर का विभिन्न भाषाओं का   सेमिनार जहां , चारों का मिलन , अचानक हुआ था , मगर ऐसा लगा , वे पिछले कई जनमों से एक दूसरे को जानती थीं । वर्तमान मे वे चार जातिओं , और चार भाषाओं , का ही नहीं , चार संप्रदाय का भी प्रतिनिधित्व कर रहीं थी ।   करिश्मा देखिए , वह सेमिनार भी चार दिनों का था । उनके लिए यह चार दिन की चाँदनी हो कर भी बहुत कुछ थी । रात्री भोजन के बाद अपने अपने कमरों से निकल कर कालेज की अल्हड़ किशोरिओ की भांति बरामदे मे अथवा बा गी चे की सीढ़ीओ पर बैठ बिंदास होकर अपने अपने गप्पों का पिटारा खोलती तो रात के तारो की भी रोशनी तेज हो जाती । किसी तरह का कोई दिखावा , मतभेद या संकोच नहीं , उन्मुक्त तितिलियों सी अतीत मे मंडरा कर वापस अपने अपने कमरों मे चली जातीं ।    आज के सेमिनार मे जा ति और धर्म की बात ने काफी तू ल पकड़ लिया था । अमुक जा ति वाले ने अमु...
  1   ( हिन्दी कविता)      मेरा पगार कहाँ है साई ?   ( 1 मई मजदूर दिवस पर विशेषरूप से घरेलू महिलाओं के लिए   ) डा ० कामिनी   कामायनी ।    खुली बहस की   बिगुल बजाकर   शहर गाँव बस्ती नगरी सब     पर्दे    छोड़ सड़कों तक   आई      सहने में अब कौन भलाई   ।    प्रेम पिपासी   जलकुंभी सी   अपनी जड़ें कभी जमा न पाई बदले पर्यावरण   की पीड़ा सी दबी लहर अब बाहर आई ।                       अलंकार उपमान    व्यर्थ के                           होते रहे कारण अनर्थ के                      बात बात पर तंज़ ही खाई    ...

मंसूर के पीले फूल और अभिशप्त यक्षिणी

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यूं ही   व्यतीत हुए कितने दिनों , महीनों , सालों , बल्कि दशकों , बाद भी ऊंचे ऊंचे पहा ड़ियों और शान से सिर उठाए , प्रहरी से खड़े पेड़ों से घिरे , कैमल बैक हिल्स पर उस नवविवाहित युगल को देख कर एक क्षण के लिए उसका यूं सिहर   जाना स्वाभाविक ही रहा होगा     ।मस्तिष्क के किसी कंदरे में कराहता कोई टीस यादों और हक़ीक़त के मजबूत क़िले की दीवार फांद   कर दिखा   गया था भुवन को , भुवन को नहीं , बल्कि उसकी झलक को   !अरे   नहीं , नहीं भुवन कहाँ !   वह   अब तक वैसा ही स्लिम ट्रिम किशोर रहा   होगा क्या ? मगर हमशक्ल ! शायद हाँ ।          इस करोड़ों अरबों की भीड़ वाली दुनिया में कभी किसी की हंसी , किसी की आँखें , चाल चलन , हाव भाव , क्या शक्ल तक इतना मिलता जुलता है कि मनुष्य का दिग्भ्रमित हो जाना   स्वाभाविक ही है । मगर उसकी झलक उसे दिल द हला देने वाली व्यतीत की झलक तो दिखला ही गई थी । सच तो य ह   है कि वह दिल में बसी उस खंडित इमारत की आभासी   झलक देखने की असीम तमन्ना लिए ही तो हजारों मील दूर से मा...