।। कृष्णोवाच ।। कामिनी कामायनी
क्यों सखा ?
विभ्रांत क्यों हो?kkk
khhhhh
ये तुम्हें क्या हो गया है ?
कितने बंधन में घिरे हो
क्या तेरा कुछ खो गया है ?
कुछ तो करना ही
पड़ेगा
मोह से विश्राम लेलो
यह धरा है कर्म भूमि
आँखें खोलो ,आँखें
खोलो ।
ये नहीं जब जानते
हैं
काल ने इनको कहा
क्या?
व्यर्थ का यह राग
कैसा ?
यह तुम्हें क्यों
बांधती है ?
ये नहीं बांधव हैं तेरे
नाम के बस मोहरे हैं
मत घिरो बादल में तम
के
आगे भी कुछ रोशनी है
कर्म हैं नियत
तुम्हारे
हाथ फिर क्यों बांधना
है ।
अब पलायन सोचते क्यों ?
अस्त्र भुजबल में सजा लो
वीरता का मंत्र लेकर
तुम भी मस्तक यूं उठा लो ।
उस अधम से मत डरो
तुम /
चल रहा अन्याय पर वह
उस पथिक का रास्ता क्या?
जो अनीति से भरा है ।
छल से ,बल से ,यूं अकल से
चाहता कुछ और है वह
।
पर नहीं वह जानता है
क्या रचा है खेल
मैंने ।
तुम उठो गाँडीव लेकर
शत्रु ही शत्रु हैं आगे।
मारना तो है तुम्हें ही
मन तुम्हारा फिर क्यों
भागे ?
द्वंध में डुबकी
लगाकर
कुछ नहीं हासिल हुआ है ।
तुम उठो हुंकार भर कर
कर्म का तेरा समय है.।
।
कामिनी कामायनी ।
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